
अयोध्या के राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल में MBBS प्रथम वर्ष के छात्र सागर पटेल ने फंदे से लटक कर आत्महत्या कर ली। इस घटना ने न सिर्फ शैक्षणिक संस्थानों की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि राज्य सरकार पर भी जवाबदेही तय करने का दबाव बना दिया है।
क्या हुआ था उस दिन?
सागर के बैचमेट्स ने बताया कि वह सुबह तक सामान्य था। दोपहर में उसके रूममेट्स कुछ काम से बाहर गए, लेकिन जब लौटे तो सागर को फंदे से झूलता पाया। तुरंत कॉलेज प्रशासन को सूचना दी गई और एम्बुलेंस से दर्शन नगर मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।
“उसका किसी से विवाद नहीं था, लेकिन वह इंटरनल एग्ज़ाम में फेल हुआ था, और मानसिक इलाज चल रहा था।” – CO अयोध्या, आशुतोष तिवारी
एग्जाम प्रेशर बना जानलेवा: डिप्रेशन की पुष्टि
प्रथम दृष्टया जांच में सामने आया है कि सागर इंटरनल एग्ज़ाम में फेल होने के कारण मानसिक तनाव में था। वह डिप्रेशन से जूझ रहा था और उसका इलाज भी चल रहा था।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह ‘हैंगिंग’ बताई गई है।
विधायक ने मांगी कड़ी जांच और मुआवज़ा
मछलीशहर विधायक रागनी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस घटना की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। साथ ही पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता दिए जाने की भी बात कही है।
“एक होनहार छात्र की ज़िंदगी यूं जाना पूरे सिस्टम पर सवाल उठाता है। जवाबदेही तय होनी चाहिए।” – विधायक रागनी
सवाल जिनका जवाब बाकी है:
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मेडिकल कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं कितनी प्रभावी हैं?

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क्या संस्थान छात्रों के एग्जाम प्रेशर को लेकर सजग हैं?
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क्या ऐसे मामलों में एडमिनिस्ट्रेशन की भूमिका केवल पोस्ट-इंसिडेंट तक सीमित रह गई है?
क्या कहता है समाज और सिस्टम?
ये घटना एक और याद दिलाती है कि डिग्री से बड़ी है ज़िंदगी। MBBS जैसे प्रोफेशन में दबाव बेहद ज़्यादा होता है, लेकिन उसकी पहचान और इलाज में हमारा सिस्टम अक्सर असफल साबित होता है।
आपकी जिम्मेदारी भी है:
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छात्रों को जज करने से पहले सुनें।
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पैरेंट्स अंक से पहले मन पर ध्यान दें।
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कॉलेज सिर्फ डिग्री सेंटर न बनें, सेफ स्पेस भी बनें।

